*देहरादून / चमोली, 28 सितंबर 2026।*
देवभूमि उत्तराखंड के चमोली जिले में हिमालय की गोद में स्थित एक रहस्यमयी झील है, जो गर्मियों में बर्फ पिघलते ही सैकड़ों इंसानी कंकालों और खोपड़ियों से भर जाती है। इसे दुनिया ‘रूपकुंड झील’ या ‘Skeleton Lake’ के नाम से जानती है।
इस झील का राज दशकों तक सिर्फ एक भूतिया लोककथा माना गया, लेकिन आधुनिक वैज्ञानिकों की DNA जांच ने ऐसा सनसनीखेज सच सामने लाया जिसने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया।
*1942 में ब्रिटिश रेंजर की हैरान करने वाली खोज*
बात द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान साल 1942 की है। लगभग 16,500 फीट की ऊंचाई पर स्थित रूपकुंड झील के पास जब ब्रिटिश फॉरेस्ट रेंजर एच.के. माधवन पहुंचे तो बर्फ के नीचे उन्हें कुछ अजीब चीजें दिखीं। नजदीक जाकर देखा तो वहां इंसानी हड्डियां, खोपड़ियां, चमड़े के जूते और प्राचीन गहने बिखरे पड़े थे।
पहले लगा कि ये विश्व युद्ध के दौरान रास्ता भटके जापानी सैनिक हैं, लेकिन जांच में ये कहीं ज्यादा प्राचीन निकले।
*आधुनिक विज्ञान को लगा सबसे बड़ा झटका*
सालों तक माना जाता रहा कि ये सभी लोग किसी एक बड़े हादसे में एक साथ मारे गए। लेकिन भारत, अमेरिका और जर्मनी के वैज्ञानिकों ने मिलकर यहां के 38 कंकालों का होल-जीनोम DNA टेस्ट और कार्बन डेटिंग की।
जांच में दो बड़े खुलासे हुए:
*1. ये मौतें एक साथ नहीं हुईं:* ये लोग एक दिन या एक साल में नहीं मरे, बल्कि इनकी मौतों के बीच लगभग 1,000 साल का अंतर था। कुछ की मौत 7वीं-8वीं सदी में हुई तो कुछ की 17वीं-18वीं सदी में।
*2. यूरोप से आए थे कुछ लोग:* कंकालों का बड़ा हिस्सा भारतीय मूल का था, जो संभवतः प्रसिद्ध नंदा राजजात यात्रा के तीर्थयात्री या उनके साथ गए कुली थे। लेकिन कुछ कंकाल ऐसे लोगों के थे जिनका DNA भूमध्य सागर यानी आज के ग्रीस और पूर्वी यूरोप के लोगों से मैच करता है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि सैकड़ों साल पहले, जब न कोई सड़क थी न तकनीक, तब ग्रीस के लोग सात समंदर पार कर उत्तराखंड के इतने दुर्गम हिमालय में क्या करने आए थे?
*मौत की वजह: आसमान से बरसे ‘लोहे जैसे ओले’*
फॉरेंसिक जांच में कई खोपड़ियों पर ऊपर से किसी भारी और गोल चीज से वार के निशान मिले, लेकिन वहां कोई हथियार नहीं मिला।
स्थानीय लोककथा के अनुसार जब देवी नंदा क्रोधित हुईं तो उन्होंने भयंकर ओलावृष्टि की। आसमान से लोहे जैसे सख्त और भारी ओले गिरे और छिपने की जगह न मिलने से सभी की दर्दनाक मौत हो गई। वैज्ञानिक भी इस थ्योरी को काफी हद तक सही मानते हैं।
आज भी रूपकुंड ट्रेक वैज्ञानिकों और ट्रैकर्स के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। यह इस बात का सबूत है कि देवभूमि के पहाड़ों में आज भी कई ऐसे राज दफन हैं जो इंसानी सोच से परे हैं।
